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The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha

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The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha A  vailable originally in verses the Jataka Stories or the collection of the stories of the previous births of Sakyamuni Buddha, (563 BC-483 BC) is the tenth book of the  Khuddaka-Nikaya,  which in turn is a part if the corpus of the  Sutta-Pitaka  belonging to the Buddhist canon. The Buddhist canons are classified into three pitakas  or collections, which literally, mean �baskets�. Traditionally, these  pitakas  were first compiled in the first Buddhist council held in Rajgir, after the  parinibbana  (or the demise) of Gotama Buddha (483 B.C) during the reign of Ajatasattu (Sanskritised: Ajatashatru), the king of Magadha. The other two Buddhist canons  are the Vinaya-Pitaka and the Abhidhamma-Pitaka.  [i]     Many scholars believe that the Tipitaka was compiled in the third Buddhist council. But such claims appear to be fragile when we turn to the  Mahava...

जातक कथासंग्रह 1

जातक कथासंग्रह 1   ज्ञानदेवांनी सातशे वर्षांपू्र्वी भागवत धर्माचा पाया रचला, त्याप्रमाणे बौद्ध धर्माचा पाया आचार्य धर्मानंद कोसंबी यांनी रचला आहे. भागवत धर्म हजारो वर्षे ज्ञानदेवांपूर्वी प्रचलित होता, तरी त्याला पुन्हा नवा पाया देणे भाग पडले. त्याचप्रमाणे बौद्ध धर्म दोन हजार वर्षांपेक्षा अधिक कालपर्यंत निम्म्या मानवी जगात प्रचलित असूनही त्याला पुन्हा नवा पाया देण्याचे आवश्यक कार्य धर्मानंदांनी केले आहे. नवा पाया देण्याचे कारण, बौद्ध धर्माला या विज्ञाननिष्ठ व बुद्धिवादी नव्या युगाच्या प्रेरणांना अनुरूप स्वरूप देणे आवश्यक आहे, हे होय. अद्‍भुत पौराणिक कथा, कल्पित प्रसंग, आणि पारलौकिक तत्त्वज्ञान यांची शेकडो पुटे मूळच्या विवेकवादी शुद्ध बौद्ध धर्मावर आणि बुद्धचरित्रावर शतकानुशतके चढलेली आहेत, त्यामुळे नव्या युगाच्या प्रेरणांशी सुसंगत असे त्याचे स्वरूप राहिलेले नाही. परंतु बुद्धचरित्राचे व बौद्ध धर्माचे मूळचे शुद्ध स्वरूप या नव्या युगाच्या प्रेरणांशी सुसंगत असेच आहे, असे ध्यानात आल्यामुळे अनेक आधुनिक पश्चिमी पंडितांनी व विशेषत: धर्मानंदांनी ते स्वरूप यशस्वी रीतीने विवेकबुद्धीने शोधून का...

फुस्स बुद्ध

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Jataka Stories -  Phussa Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  096 -    Phussa Buddha / फुस्स बुद्ध            चौबीस बुद्धों की परिगणना में फुस्स बुद्ध का स्थान अट्ठारहवाँ हैं। इनका जन्म काशी के सिरिमा उद्यान में हुआ था। इनके पिता का नाम जयसेन था जो एक कुलीन क्षत्रिय थे। मनोरत्थपूरणी के अनुसार उनके पिता का नाम महिन्द्र था। उनकी एक बहन थी और तीन सौतेले भाई। इनकी पत्नी का नाम किसागोतमा था, जिससे उन्हें आनन्द नाम के पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई थी। परम्परा के अनुसार उनकी लम्बाई अट्ठावन हाथों की थी तथा वे गरुड, हंस तथा सुवम्णभार नामक तीन प्रासादों में छ: हज़ार वर्षों तक रहे। तत: एक हाथी पर सवार हो उनहोंने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। एवं छ: वर्षों के तप के बाद उन्होंने सम्बोधि प्राप्त की। सम्बोधि के ठीक पूर्व उन्होंने एक श्रेष्ठी कन्या सिरिवड्ढा के हाथों खीर और सिखिवड्ढ नामक एक संयासी द्वारा प्रदत्त घास का आसन ग्रहण किया था। एक अमन्द (आम्लक) वृक्ष के नीचे विद्या बोधि की प्राप्ति की। स...

कोनगमन बुद्ध

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Jataka Stories -  Konagamana Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  101  -    Konagamana Buddha /   कोनगमन बुद्ध    Konagamana Buddha on the panel Cave 17, Ajanta कोनगमन तेईसवें बुद्ध माने जाते हैं। ये भद्वकप्र (भद्र कल्प) के दूसरे बुद्ध हैं। सोभावती के समगवती उद्यान में जन्मे कोनगमन के पिता का नाम यञ्ञदत्त था। उत्तरा उनकी माता थी। इनकी धर्मपत्नी का नाम रुचिगत्ता था; और उनके पुत्र का नाम सत्तवाहा। तीन हज़ार सालों तक एक गृहस्थ के रुप में रहने के बाद एक हाथी पर सवार होकर इन्होंने गृह-त्याग किया और संयास को उन्मुख हुए। छ: महीनों के कठिन तप के बाद इन्होंने अग्गिसोमा नाम की एक ब्राह्मण कन्या के हाथों खीर ग्रहण किया। फिर तिन्दुक नामक व्यक्ति द्वारा दी गई घास का आसन उदुम्बरा वृक्ष के नीचे बिछा कर तब तक समाधिस्थ रहे जब तक कि मेबोधि प्राप्त नहीं की। तत: सुदस्मन नगर के उद्यान में उनहोंने अपना पहला उपदेश दिया। भिथ्य व उत्तर उनके प्रमुख शिष्य थे और समुद्दा व उत्तरा उनकी प्रमुख शिष्याएँ। कोपगमन का नाम कनकगमन से विश्...

कस्सप बुद्ध

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Jataka Stories -  Matanga  -  Kassapa Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  102  -    Kassapa Buddha / कस्सप बुद्ध     Kassapa Buddha  on the panel Cave 17, Ajanta कस्सप बुद्ध पालि परम्परा में परिगणित चौबीसवें बुद्ध थे। इनका जन्म सारनाथ के इसिपतन भगदाय में हुआ था, जहाँ गौतम बुद्ध ने वर्षों बाद अपना पहला उपदेश दिया था। काश्यप गोत्र में उतपन्न कस्सप को पिता का नाम ब्रह्मदत्त था और माता का नाम धनवती। उनके जन्मकाल में वाराणसी में राजा किकी राज्य करते थे। इनकी धर्मपत्नी का नाम सुनन्दा था, तथा पुत्र का नाम विजितसेन। दो हज़ार वर्षों तक गृहस्थ जीवन भोगने के बाद उन्होंने संयास का मार्ग अपनाया। सम्बोधि के पूर्व उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें खीर खिलाई थी और सोम नामक एक व्यक्ति ने आसने के लिए घास दिये थे। उनका बोधि-वृक्ष एक वट का पेड़ था। कस्सप बुद्ध ने अपना पहला उपदेश इसिपतन में दिया था। तिस्स और भारद्वाज उनके प्रमुख शिष्य थे तथा अतुला और उरुवेला उनकी प्रमुख शिष्याएँ। उनके काल में बोधिसत्त का जन्म एक ब्राह्मण...

ककुसन्ध बुद्ध

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Jataka Stories -  Kakusandha Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  100  -    Kakusandha Buddha  /   ककुसन्ध बुद्ध    Kakusandha Buddha  on the panel Cave 17, Ajanta पालि-परम्परा में ककुसन्ध बाईसवें बुद्ध हैं। ये खेमा वन में जन्मे थे। इनके पिता अग्गिदत्त खेमावती के राजा खेमंकर के ब्राह्मण पुरोहित थे। इनकी माता का नाम विशाखा था। इनकी पत्नी का नाम विरोचमना और पुत्र का नाम उत्तर था। इन्होंने चार हज़ार वर्ष की आयु में एक रथ पर चढ़ कर सांसारिक जीवन का परित्याग किया और आठ महीने तपस्या की। बुद्धत्व-प्राप्ति से पूर्व इन्होंने सुचिरिन्ध ग्राम की वजिरिन्धा नामक ब्राह्मण-कन्या से खीर ग्रहण की और ये सुभद्द द्वारा निर्मित कुशासन पर बैठे। शिरीष-वृक्ष के नीचे इन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई और अपना प्रथम उपदेश इन्होंने मकिला के निकट एक उद्यान में, चौरासी हज़ार भिक्षुओं को दिया। भिक्षुओं में विधुर एवं संजीव इनके पट्टशिष्य थे और भिक्षुणियों में समा और चम्पा। बुद्धिज इनके प्रमुख सेवक थे। प्रमुख आश्रयदाता थे- पुरुषों में अच...

जनपद कल्याणी की आध्यात्मिक यात्रा

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Jataka Stories -  The Spiritual Journey of Janapada Kalyani The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  095 -    The Spiritual Journey of Janapada Kalyani /  जनपद कल्याणी की आध्यात्मिक यात्रा   जब नन्द के प्रत्यावर्तन की सभी आशाएँ विफल हो गईं, तो शनै:-शनै: जनपद कल्याणी इस दु:ख से उबरने लगीं। थोड़े समय बाद, उन्हें लगा कि उनका सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ और उद्देश्यहीन हो चुका है, सो उन्होंने संघ में शरण लेने का विचार बनाया। पजापति के निर्देशन में उन्होंने सांसारिक जीवन का परित्याग कर दिया और संघ में शरण ले ली। तब तक बुद्ध ने संघ में भिक्षुणियों के प्रवेश की अनुमति दे दी थी। यद्यपि उन्होंने संसार-त्याग कर दिया था पर अपने शरीर के प्रति उनका मोह कम नहीं हुआ था। अपने शारीरिक सौष्ठव का गर्व सदा उनमें पलता रहता। अपि च, शारीरिक सौन्दर्य सहित अन्य सभी सांसारिक वस्तुओं की अनित्यता को रेखांकित करते बुद्ध-वचनों को सुनने की वे हिम्मत न करतीं। साथ ही, उन्होंने यह भी कभी नहीं सोचा कि उनकी अप्रतिम सुन्दरता एक दिन धूमिल हो जाएगी। फिर भी, एक दिन, मठ...