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Showing posts from August, 2020

फुस्स बुद्ध

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Jataka Stories -  Phussa Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  096 -    Phussa Buddha / फुस्स बुद्ध            चौबीस बुद्धों की परिगणना में फुस्स बुद्ध का स्थान अट्ठारहवाँ हैं। इनका जन्म काशी के सिरिमा उद्यान में हुआ था। इनके पिता का नाम जयसेन था जो एक कुलीन क्षत्रिय थे। मनोरत्थपूरणी के अनुसार उनके पिता का नाम महिन्द्र था। उनकी एक बहन थी और तीन सौतेले भाई। इनकी पत्नी का नाम किसागोतमा था, जिससे उन्हें आनन्द नाम के पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई थी। परम्परा के अनुसार उनकी लम्बाई अट्ठावन हाथों की थी तथा वे गरुड, हंस तथा सुवम्णभार नामक तीन प्रासादों में छ: हज़ार वर्षों तक रहे। तत: एक हाथी पर सवार हो उनहोंने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। एवं छ: वर्षों के तप के बाद उन्होंने सम्बोधि प्राप्त की। सम्बोधि के ठीक पूर्व उन्होंने एक श्रेष्ठी कन्या सिरिवड्ढा के हाथों खीर और सिखिवड्ढ नामक एक संयासी द्वारा प्रदत्त घास का आसन ग्रहण किया था। एक अमन्द (आम्लक) वृक्ष के नीचे विद्या बोधि की प्राप्ति की। स...

कोनगमन बुद्ध

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Jataka Stories -  Konagamana Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  101  -    Konagamana Buddha /   कोनगमन बुद्ध    Konagamana Buddha on the panel Cave 17, Ajanta कोनगमन तेईसवें बुद्ध माने जाते हैं। ये भद्वकप्र (भद्र कल्प) के दूसरे बुद्ध हैं। सोभावती के समगवती उद्यान में जन्मे कोनगमन के पिता का नाम यञ्ञदत्त था। उत्तरा उनकी माता थी। इनकी धर्मपत्नी का नाम रुचिगत्ता था; और उनके पुत्र का नाम सत्तवाहा। तीन हज़ार सालों तक एक गृहस्थ के रुप में रहने के बाद एक हाथी पर सवार होकर इन्होंने गृह-त्याग किया और संयास को उन्मुख हुए। छ: महीनों के कठिन तप के बाद इन्होंने अग्गिसोमा नाम की एक ब्राह्मण कन्या के हाथों खीर ग्रहण किया। फिर तिन्दुक नामक व्यक्ति द्वारा दी गई घास का आसन उदुम्बरा वृक्ष के नीचे बिछा कर तब तक समाधिस्थ रहे जब तक कि मेबोधि प्राप्त नहीं की। तत: सुदस्मन नगर के उद्यान में उनहोंने अपना पहला उपदेश दिया। भिथ्य व उत्तर उनके प्रमुख शिष्य थे और समुद्दा व उत्तरा उनकी प्रमुख शिष्याएँ। कोपगमन का नाम कनकगमन से विश्...

कस्सप बुद्ध

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Jataka Stories -  Matanga  -  Kassapa Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  102  -    Kassapa Buddha / कस्सप बुद्ध     Kassapa Buddha  on the panel Cave 17, Ajanta कस्सप बुद्ध पालि परम्परा में परिगणित चौबीसवें बुद्ध थे। इनका जन्म सारनाथ के इसिपतन भगदाय में हुआ था, जहाँ गौतम बुद्ध ने वर्षों बाद अपना पहला उपदेश दिया था। काश्यप गोत्र में उतपन्न कस्सप को पिता का नाम ब्रह्मदत्त था और माता का नाम धनवती। उनके जन्मकाल में वाराणसी में राजा किकी राज्य करते थे। इनकी धर्मपत्नी का नाम सुनन्दा था, तथा पुत्र का नाम विजितसेन। दो हज़ार वर्षों तक गृहस्थ जीवन भोगने के बाद उन्होंने संयास का मार्ग अपनाया। सम्बोधि के पूर्व उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें खीर खिलाई थी और सोम नामक एक व्यक्ति ने आसने के लिए घास दिये थे। उनका बोधि-वृक्ष एक वट का पेड़ था। कस्सप बुद्ध ने अपना पहला उपदेश इसिपतन में दिया था। तिस्स और भारद्वाज उनके प्रमुख शिष्य थे तथा अतुला और उरुवेला उनकी प्रमुख शिष्याएँ। उनके काल में बोधिसत्त का जन्म एक ब्राह्मण...

ककुसन्ध बुद्ध

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Jataka Stories -  Kakusandha Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  100  -    Kakusandha Buddha  /   ककुसन्ध बुद्ध    Kakusandha Buddha  on the panel Cave 17, Ajanta पालि-परम्परा में ककुसन्ध बाईसवें बुद्ध हैं। ये खेमा वन में जन्मे थे। इनके पिता अग्गिदत्त खेमावती के राजा खेमंकर के ब्राह्मण पुरोहित थे। इनकी माता का नाम विशाखा था। इनकी पत्नी का नाम विरोचमना और पुत्र का नाम उत्तर था। इन्होंने चार हज़ार वर्ष की आयु में एक रथ पर चढ़ कर सांसारिक जीवन का परित्याग किया और आठ महीने तपस्या की। बुद्धत्व-प्राप्ति से पूर्व इन्होंने सुचिरिन्ध ग्राम की वजिरिन्धा नामक ब्राह्मण-कन्या से खीर ग्रहण की और ये सुभद्द द्वारा निर्मित कुशासन पर बैठे। शिरीष-वृक्ष के नीचे इन्हें ज्ञान-प्राप्ति हुई और अपना प्रथम उपदेश इन्होंने मकिला के निकट एक उद्यान में, चौरासी हज़ार भिक्षुओं को दिया। भिक्षुओं में विधुर एवं संजीव इनके पट्टशिष्य थे और भिक्षुणियों में समा और चम्पा। बुद्धिज इनके प्रमुख सेवक थे। प्रमुख आश्रयदाता थे- पुरुषों में अच...

जनपद कल्याणी की आध्यात्मिक यात्रा

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Jataka Stories -  The Spiritual Journey of Janapada Kalyani The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  095 -    The Spiritual Journey of Janapada Kalyani /  जनपद कल्याणी की आध्यात्मिक यात्रा   जब नन्द के प्रत्यावर्तन की सभी आशाएँ विफल हो गईं, तो शनै:-शनै: जनपद कल्याणी इस दु:ख से उबरने लगीं। थोड़े समय बाद, उन्हें लगा कि उनका सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ और उद्देश्यहीन हो चुका है, सो उन्होंने संघ में शरण लेने का विचार बनाया। पजापति के निर्देशन में उन्होंने सांसारिक जीवन का परित्याग कर दिया और संघ में शरण ले ली। तब तक बुद्ध ने संघ में भिक्षुणियों के प्रवेश की अनुमति दे दी थी। यद्यपि उन्होंने संसार-त्याग कर दिया था पर अपने शरीर के प्रति उनका मोह कम नहीं हुआ था। अपने शारीरिक सौष्ठव का गर्व सदा उनमें पलता रहता। अपि च, शारीरिक सौन्दर्य सहित अन्य सभी सांसारिक वस्तुओं की अनित्यता को रेखांकित करते बुद्ध-वचनों को सुनने की वे हिम्मत न करतीं। साथ ही, उन्होंने यह भी कभी नहीं सोचा कि उनकी अप्रतिम सुन्दरता एक दिन धूमिल हो जाएगी। फिर भी, एक दिन, मठ...

वेस्सभू बुद्ध

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Jataka Stories -  Vessabhu Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  099 -    Vessabhu Buddha / वेस्सभू बुद्ध        Vessabhu Buddha  on the panel Cave 17, Ajanta    वेस्सभू बुद्ध पालि परम्परा में इक्कीसवें बुद्ध के रुप में मान्य हैं। उनके पिता का नाम सुप्पतित्त तथ माता का नाम यसवती था। उनका जन्म अनोम नगर में हुआ था तथा उनका नाम वेस्सभू रखा गया था क्योंकि पैदा होते ही उन्होंने वृसभ की आवाज़ निकाली थी। उनकी पत्नी का नाम सुचित्रा तथा पुत्र का नाम सुप्पबुद्ध था। छ: हज़ार सालों तक रुचि, सुरुचि और वड्ढन नामक प्रासादों में सुख-वैभव का जीवन-यापन करने के बाद सोने की पालकी में बैठकर उन्होंने अपने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। तत: छ: महीनों के तप के पश्चात् उन्होंने एक साल वृक्ष के नीचे सम्बोधि प्राप्त की। सम्बोधि के पूर्व उन्होंने सिरिवड्ञना नामक कन्या के हाथों खीर ग्रहण किया था। उनका आसन नागराज नरीन्द ने एक साल वृक्ष के नीचे बिताया था। उन्होंने अपने प्रथम उपदेश अपने दो भाई सोन और उत्तर को दिये थे,...

नंद कुमार

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Jataka Stories - Nanda The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  093 -    Nanda /  नंद कुमार बुद्ध के सौतेले भाई तथा उनकी माता की छोटी बहन के पुत्र नंद जिस दिन जनपद कल्याणी के साथ परिणय-सूत्र में बँधने वाले थे उसी दिन बुद्ध उनके महल में पहुँचे। फिर उनसे अपने भिक्षाटन के कटोरे को उठा अपने साथ अपने विहार ले आये। विहार लाकर बुद्ध ने उन्हें भी भिक्षु बना दिया। नंद ने भी भिक्षुत्व स्वीकार किया किन्तु उनका मन बार-बार जनपद-कल्याणी की ओर खींच-खींच जाता था। एक दिन बुद्ध नंद को हिमालय की सैर कराने ले गये। वहाँ उन्होंने एक जली हुई बंदरिया का मृत शरीर देखा। नंद से पूछा, "क्या जनपद कल्याणी इससे भी अधिक सुंदर है?" नंद ने कहा, "हाँ"। तब बुद्ध उन्हें आकाश-मार्ग से उड़ाते हुए तावतिंस लोक ले गये, जहाँ सबक (शक्र; इन्द्र) और उसकी अपूर्व सुंदरियों ने उनकी आवभगत की। बुद्ध ने तब नंद से पूछा, "क्या जनपद कल्याणी इन सुंदरियों से भी सुंदर है?" तब नंद ने कहा, "नहीं"। बुद्ध ने नंद के सामने तब यह प्रस्ताव रखा कि यदि वे भिक्षु की चर्या अपनाएंगे तो उनकी...

विपस्सी बुद्ध

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Jataka Stories -  Vipassi Buddha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  097 -    Vipassi Buddha / विपस्सी बुद्ध        पालि परम्परा में विपस्सी उन्नीसवें बुद्ध माने जाते हैं। उनका जन्म बन्धुमती के खेम-उद्यान में हुआ था। उनकी माता का नान भी बन्धुमती था। उनके पिता का नाम बन्धुम था, जिनका गोत्र कोनडञ्ञ था। उनका विवाह सूतना के साथ हुआ था जिससे उन्हें समवत्तसंघ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। एक रथ पर सवार हो उन्होंने अपने गृहस्थ-जीवन का परित्याग किया था। तत: आठ महीने के तप के बाद उन्होंने एक दिन सुदस्सन-सेट्ठी की पुत्री के हाथों खीर ग्रहण कर पाटलि वृक्ष के नीचे बैठ सम्बोधि प्राप्त की। उस वृक्ष के नीचे उन्होंने जो आसन बनाया था उसके लिए सुजात नामक एक व्यक्ति ने घास दी थी। सम्बोधि प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना पहला उपदेश अपने भाई संघ और अपने कुल पुरोहित पुत्र-लिस्स को खोयमित्रदाय में दिया था। अशोक उनके मुख्य उपासक थे तथा चंदा एवं चंदमिता उनकी मुख्य उपासिकाएँ थी। पुनब्बसुमित्त एवं नाग उनके मुख्य प्रश्रयदाता तथा स...

धम्म चक्र-पवत्तन-कथा

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Jataka Stories - Dhamma-Chakka-Pavattana-Katha The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  081 -  Dhamma-Chakka-Pavattana-Katha /     धम्म चक्र-पवत्तन-कथा    सम्बोधि-प्राप्ति के पश्चात् तथा ब्रह्मसहम्पति के अनुरोध पर गौतम बुद्ध ने 'बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय' हेतु धर्म-चक्र प्रवर्तन (धम्म-चक्र-पवत्तन) अर्थात् अपने ज्ञान-देशना के चक्र को चलायमान रखने की प्रतिज्ञा ली। तत: उन्हें सर्वप्रथम आकार कालाम की याद आई जिन्हें उन्होंने महानिष्क्रमण के बाद अपना पहला अल्पकालीन गुरु वरण किया था। लेकिन दिव्य चक्षु से उन्हें ज्ञात हुआ कि आकार की मृत्यु हो चुकी थी। तब बुद्ध ने अपने दूसरे अल्पकालीन गुरु उद्दकराम पुत्र को पहली देशना देने की सोची। किन्तु दिव्य चक्षु से उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका भी निधन हो चुका था। तब उन्होंने पाँच संयासियों को अपनी पहली देशना देने की सोची। ये संयासी छ: वर्षों तक बुद्ध के साथ कठिन तप करते रहे थे किन्तु बुद्ध ने जब अति-कठिन साधना की अनुपयुक्तता को समझ कर सामान्य भोजन को उन्मुख हो गये तो वे पाँच तपस्वी उन्हें छोड़ स...

जनपद कल्याणी नंदा

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Jataka Stories -  Janapada Kalyani Nanda The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  094 -    Janapada Kalyani Nanda /  जनपद कल्याणी नंदा        बुद्ध के भाई नंद की मंगेतर जनपद कल्याणी नंदा अपने काल की अपूर्व रुपसी थी। उसका नाम 'जनपद कल्याणी' इसलिए पड़ा था कि उसका रुप, लावण्य और शोभा और श्री समस्त जनपद के लिए कल्याणकारी माना जाता था। नंद से उसका प्रगाढ प्रेम था और उनसे शादी की आशा में वह फूले न समा रही थी। किन्तु जिस दिन वह नंद के साथ परिणय-सूत्र में बंधने जा रही थी और अपनी शादी की सारी तैयारियों को निहार-निहार पुलकित हो रही थी ठीक उसी समय उसने नंद को बुद्ध के साथ बुद्ध के भिक्षाटन के कटोरे को लिये प्रासाद से बाहर जाते देखा। फिर बहुत देर तक उनके लौटने की राह तकती रही । देर शाम तक नंद वापिस न लौटे। तभी अचानक उसे यह सूचना दि गयी कि नंद भी गृहस्थ त्याग भिक्षु बन चुके थे। इस सूचना से जनपद कल्याणी नंदा को गहरा आघात लगा और वह मूर्व्हिच्छत हो गई। J  anapada Kalyani Nanda was the prettiest maiden of the  jan...

बिम्बिसार

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Jataka Stories - Bimbisara The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  092 -    Bimbisara / बिम्बिसार       मगध के राजा बिम्बिसार की राजधानी राजगीर थी। बिम्बिसार गौतम बुद्ध के सबसे बड़े प्रश्रयदाता थे। वे पन्द्रह वर्ष की आयु में राजा बने और अपने पुत्र अजातसत्तु (संस्कृत- अजातशत्रु) के लिए राज-पाट त्यागने से पूर्व बावन वर्ष इन्होंने राज्य किया। राजा पसेनदी की बहन और कोसल की राजकुमारी, इनकी पत्नी और अजातसत्तु की माँ थी। खेमा, सीलव और जयसेना नामक इनकी अन्य पत्नियाँ थीं। विख्यात वारांगना अम्बापालि से इनका विमल कोन्दन्न नामक पुत्र भी था। सुत्तनिपात अट्ठकथा के पब्बज सुत्त के अनुसार, इन्होंने संयासी गौतम का प्रथम दर्शन पाण्डव पब्बत के नीचे अपने राजभवन के गवाक्ष से किया और उनके पीछे जाकर, उन्हें अपने राजभवन में आमंत्रित किया। गौतम ने इनका निमंत्रण अस्वीकार किया तो इन्होंने गौतम को उनकी उद्देश्य-पूर्ति हेतु शुभकामनाएँ दी और बुद्धत्व-प्राप्ति के उपरान्त उन्हें फिर से राजगीर आने का निमंत्रण दिया। तेभतिक जटिल के परिवर्तन के बाद, बु...

मार-कथा

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Jataka Stories - Story of Mara The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  091 -    Story of Mara /  मार-कथा      Mara  बौद्ध-परम्परा में मार मृत्यु, कुकृत बल और प्रलोभक के रुप में जाना जाता है जिसे आधुनिक भाषा में शैतान का रुप समझा जा सकता हैं। जब यह कहा जाता है कि 'मार एक है' तो वह क्लेश अथवा मृत्यु का द्योतक है। मार के पाँच रुप माने जाते हैं जब उसे पाँच संघों के संदर्भ में समझा जाता है। पुन: मार को अभिसड्खार मार तथा यम के चार देव पुत्रों के रुप में भी स्वीकार किया गया है। मार को नमुचि का नाम दिया गया है क्योंकि कोई भी उससे नहीं बच सकता। उसे वसवत्ती भी कहा जाता हैं क्योंकि वह हर कोई को अपने वश में करता हैं। जब भी वह किसी को शील के मार्ग पर अग्रसर देखता है तो उसे पथ-भ्रष्ट करने के लिए अनेकों अवरोध उत्पन्न करता हैं। उदाहरण के लिए श्रेष्ठी-जातक में जब एक राजा किसी पच्चेक बुद्ध को दान देने के लिए उन्मुख होता है तो मार उसके मामने एक विशालकाय खाई उत्पन्न करता है जिससे अग्नि की प्रचण्ड लपटें भयंकर गर्ज़ना के साथ उठती है...

मोग्गलन

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Jataka Stories - Moggallana The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  090 -   Moggallana / मोग्गलन     बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों में से एक थे- मोग्गलन, जिन्हें पालि परम्परा में, महामोग्गलन भी कहा जाता है। इन्हें बुद्ध ने सारिपुत्त के साथ एक ही दिन दीक्षा दी थी और यह भी घोषणा कि थी कि ये दोनों उनके प शिष्य हैं। सारिपुत्त जहाँ अपनी बुद्धिमत्ता के लिए विख्यात थे, वहीं मोग्गलन अपनी अद्भुत चामत्कारिक शक्तियों के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरण के लिए, वे विविध जीवन्त आकृतियों के निर्माण में समर्थ थे, कोई भी रुप धारण कर सकते थे। एक बार उन्होंने मिगरमतुपसाद नामक मठ को अपने चरण-स्पर्श मात्र से हिला दिया था। यह भू-तल के उन कुछ भिक्षुओं के लिए चेतावनी थी जो यह जानते हुए भी गल्प-कथन में मग्न थे कि स्वयं बुद्ध उस मठ के प्रथम तल पर विद्यमान हैं। मोग्गलन और सारिपुत्त एक ही दिन जन्मे थे। इनकी माता का नाम मोग्गली (या मोग्गलानी) होने से इनका नाम मोग्गलन पड़ा। इनके गाँव के नाम की वजह से इन्हें कोलित भी कहा जाता था। मोग्गलन और सारिपुत्त के परिवारों के ब...

सारिपुत्र

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Jataka Stories - Sariputta The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  089 -   Sariputta /  सारिपुत्र    Sariputta in meditation with the shaven head, which tempted the  yaksa  to give a blow there सारिपुत्र (शारिपुत्र) और मोग्गल्लान बुद्ध के दो प्रमुख शिष्य 'धम्म-सेनापति' के नाम प्रसिद्ध हैं। सारिपुत्र का वास्तविक नाम उपतिस्स था। बौद्ध परम्परा में उन्हें सारिपुत्र का नाम इस कारण दिया गया था कि वे नालक निवासिनी रुपसारी के पुत्र (पुत्त) थे। उनका दृढ़ संकल्प बौद्ध इतिहास में विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। गौतम बुद्ध के पुत्र राहल की उपसंपटा (दीक्षा) भी उनके द्वारा की गई थी। अभिधम्म-बुद्ध धम्म की मौलिक विवेचनात्मक सूक्ष्मता की देशना है। इसे धरती पर सुनने वाले सबसे पहले मानव सारिपुत्र थे और समस्त मानव-जाति में वे अकेले व्यक्ति थे जिसे बुद्ध के मुख से सीधी सुनने का गौरव भी प्राप्त हैं।  इस प्रकार हम देखते हैं कि सीधी सुनने का गौरव भी प्राप्त हैं। धरती पर अभिधम्म की ज्योति जलाने वाले पहले आचार्य सारिपुत्र थे जिन्होंने गुरु-...

सुजाता

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Jataka Stories - Sujata The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  088 -   Sujata /  सुजाता     सम्बोधि-प्राप्ति के पूर्व बुद्धों का किसी न किसी महिला के हाथों खीर का ग्रहण करना कोई अनहोनी घटना नहीं रही हैं। उदाहरणार्थ, विपस्सी बुद्ध ने सुदस्सन-सेट्ठी पुत्री से, सिखी बुद्ध ने पियदस्सी-सेट्ठी-पुत्री से, वेस्सयू बुद्ध ने सिखिद्धना से, ककुसंघ बुद्ध ने वजिरिन्धा से, कोमागमन बुद्ध ने अग्गिसोमा से, कस्सप बुद्ध अपनी पटनी सुनन्दा से तथा गौतम बुद्ध ने सुजाता से खीर ग्रहण किया था। पाँच तपस्वी साथियों के साथ वर्षों कठिन तपस्या करने के बाद गौतम ने चरम तप का मार्ग निर्वाण प्राप्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना। तत: उन तपस्वियों से अलग हो वे जब अजपाल निग्रोध वृक्ष के नीचे बैठे तो उनमें मानवी संवेदनाओं के अनुरुप मानवीय आहार ग्रहण करने की इच्छा उत्पन्न हुई जिसे सुजाता नाम की महिला ने खीर अपंण कर पूरा किया। उस वृक्ष के नीचे एक बार उसवेला के निकटवर्ती सेनानी नाम के गाँव के एक गृहस्थ की पुत्री सुजाता ने प्रतिज्ञा की थी के पुत्र-रत्न प्रप्ति के ब...

सुद्धोदन

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Jataka Stories - Suddhodana The Illustrated Jataka : Other Stories of the Buddha by C.B. Varma  087 -   Suddhodana / सुद्धोदन      गौतम बुद्ध के पिता शाक्यवंसी सुद्धोदन, राजा सीहहनु के पुत्र कपिवस्तु के राजा थे। उनकी माता का नाम कच्चाना था, जो देवदत के राजा देवदत सक्क की राजकुमारी था। सुद्धोदन के चार सहोदर भाई द्योतदन, सक्कोदन, सुक्कोदन तथा अमितोदन थे। उनकी दो बहनें थी- अमिता और पमिता। सुद्धोदन की पटरानी गौतम बुद्ध की माता महामाया थी, जिनकी मृत्यु के पश्चात् महाप्रजापति गौतमी की छोटी बहन जो महामाया के साथ ही उनसे ब्याही गयी थी, उनकी नयी पटरानी बनी। जब उनके कुल-गुरु असित बुद्ध के जन्म पर कपिलवस्तु पधारे और शिशु में बुद्धत्व के सारे लक्षणों का अवलोकन कर उनके पैरों को अपने शीश से सटा प्रणाम किया तो सुद्धोदन ने भी बुद्ध का पूजन किया। सुद्धोदन ने बुद्ध का पूजन दूसरी बार तब किया जब बुद्ध हल-जोतने की रीति निभाते हुए एक जम्बु-वृक्ष के नीचे बैठ ध्यानमग्न थे। सुद्धोदन ने जब विशिष्ट ज्योतिषियों के द्वारा गौतम के बुद्ध बनने की संभावना को सुना तो उन्होंने हर सम्भव ...